अछूत

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सुरेन्द्र देव गौड़

सैकड़ों वर्षों से हिंदू समाज पर एक कलंक लगाया जाता है की वह अछूत जैसी अमानवीय प्रथा का जनक तथा समर्थक रहा है. इस प्रथा का विरोध हिंदू समाज के भीतर से भी किया गया तथा बाहर से भी. हिंदू समाज के भीतर से हमेशा ही भेदभाव आधारित व्यवस्था का विरोध किया गया. इस संदर्भ में गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, गुर गोरखनाथ, कबीर, रैदास जैसे महामानवों की लंबी श्रंखला मौजूद है. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान तमाम सामाजिक सुधारकों ने इसके उन्मूलन का प्रयास किया. इस संदर्भ में दयानंद सरस्वती एज्योतिबा फुले, डॉक्टर अंबेडकर तथा महात्मा गांधी का नाम लिया जा सकता है. इन नामों की लंबी श्रंखला हिंदू समाज की एक महान विशेषता को सामने लाती है की इस समाज में सुधार की अपार संभावनाएं हमेशा मौजूद रही है. विरोधियों ने हिंदू समाज को जड़ घोषित किया तथा आज भी करते हैं लेकिन यह समाज हमेशा से गतिशील तथा परिवर्तनशील रहा है.
इन व्यक्तित्वों के साथ कुछ पुरातन पंथियों ने कड़वा व्यवहार भी किया था लेकिन कभी भी इनको ईसा मसीह की भांति सूली पर नहीं लटकाया गया ना ही मंसूर की तरह काट डाला गया. हिंदू समाज से बाहर के लोगों ने इस प्रथा को आधार बनाकर हिंदूओं को अन्य धर्मों की तरफ खींचने का प्रयास किया तथा बड़ी संख्या में सफलता प्राप्त की इस प्रयास में विचार, भय तथा लालच का भरपूर इस्तेमाल किया गया लेकिन परिवर्तित लोगों को कभी भी अपने समाज में उच्च स्थान नहीं दिया गया. विदेशी धर्मों ने खुलेआम स्वीकारा की ईश्वर तक पहुंचने के लिए केवल और केवल उनका ही मार्ग उपलब्ध है. इन धर्मों ने वैकल्पिक मार्गो को कभी भी स्वीकार नहीं किया. इन धर्मों के अनुसार बौद्ध, जैन, हिंदू, पारसी इत्यादि धर्मों का पालन करने वाले कभी भी ईश्वर तथा उसके संदेश वाहक की कृपा के पात्र नहीं. क्या यह विचार घोषणा अछूत प्रथा का ही दूसरे मार्ग से सृजन नहीं है यद्यपि शैली तथा स्थान की भिन्नता अवश्य है? इन धर्मों ने हिंदू समाज को हमेशा अछूत प्रथा के लिए कोसा लेकिन स्वयं करोड़ों हिंदुओं, बौद्धों, जैन धर्मावलंबियों इत्यादि को ईश्वर की संभावनाओं से बहिष्कृत कर दिया. वाह, क्या तार्किकता है. जन्म के आधार पर आधारित अछूत प्रथा का विरोध करते करते पूजा पद्धति के आधार पर, वह भी परमात्मा के तल परए मनुष्यों का बहिष्कार।
वर्तमान में भारतवर्ष तथा विश्व कोविड-19 से मुकाबला कर रहे हैं. पीड़ा की बात है की इसका इलाज अभी उपलब्ध नहीं है तथा शारीरिक दूरी ही एकमात्र बचाओ माना जा रहा है. शारीरिक दूरी मुझे अछूत प्रथा का एहसास करा रही है. कोविड-19 मनुष्यों के लिए कई संदेश लेकर आया है. इसने प्रत्येक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के लिए अछूत बना दिया है. मंत्री या संतरी, अधिकारी या नौकर, नास्तिक या आस्तिक, गोरा या काला, धनी या गरीब सभी इस शारीरिक दूरी के नियम को जीवन में स्वीकार कर रहे हैं. इस बीमारी ने शरीर के स्तर पर प्रत्येक मनुष्य को अछूत बना डाला है. समय है की हम बड़प्पन का दंभ छोड़ें तथा सामाजिक समरसता को अंगीकार करें. 
एक सूक्ष्म अदृश्य शक्ति ने मानव को उसकी वास्तविक हैसियत का परिचय करवाने का प्रयास किया है. जो व्यक्ति आपदा के इस काल में विचार मंथन कर अमृत रूपी ज्ञान को प्राप्त करे तथा बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में कदम उठाए वही श्रेष्ठ मानव होगा. आइए इस सामाजिक कुरीतिए जो बुद्धि के तल पर जन्म लेती है, उसका त्याग करें तथा सम्यक मार्ग पर चलने का संकल्प लें. यदि हम ऐसा कर पाए तो यह आपदा काल भविष्य में ईश्वरीय कृपा का मार्ग प्रशस्त करेगा.

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