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हरियाली का प्रतीक, हरेला पर्व का महत्व

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राजीव थपलियाल

यह तो हम सभी लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि, पर्यावरण को पूर्णरूपेण समर्पित हरेला एक हिंदू त्यौहार है जो मूल रूप से नैसर्गिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात पुण्यतोया भारत वसुंधरा के 27 वें प्रांत उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाता है। लेकिन समय की नजाकत, या यूं कहें कि सभी जगह तरह-तरह के बदलावों को देखते हुए अब यह त्यौहार समूचे उत्तराखंड में काफी लोकप्रिय हो गया है, इसकी जड़ें धीरे-धीरे बहुत मजबूत होती चली जा रही हैं और पूरे महीने भर यह त्यौहार बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाने लगा है।इसकी शुरूआत आप और हम मिलकर भी कर रहे हैं। इस दौरान अधिकांश लोग अपने घर-आंगन, बगीचों,सार्वजनिक स्थानों,विद्यालयों, सड़क के किनारे,खेतों के किनारे, आदि जगहों पर फलदार,छायादार,औषधीय तथा जानवरों के लिए घास-चारा प्रदान करने वाले वृक्षों का रोपण करके वसुधा को हरा-भरा करने का प्रयास करते हैं,ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे,और हम सभी वसुंधरा वासियों को जीने के लिए स्वच्छ हवा मिल सके।हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है-

1- चैत्र मास में – हरेला बीज रूप में पहले दिन बोया जाता है तथा नवमी के दिन काटा जाता है।
2- श्रावण मास में – सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है।
3- आश्विन मास में – आश्विन मास में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है।

परन्तु हमारे खूबसूरत राज्य उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला पर्व को ही सभी लोगों द्वारा अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि श्रावण मास भगवान आशुतोष जी को बहुत प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पहाड़ों पर ही भगवान भोले शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है।

सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह -सुबह पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने सिर पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया तथा काटा जाता है। इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी। साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी सभी लोगों द्वारा की जाती है।

अगर सही मायने में देखा जाय तो हरेला सिर्फ एक त्योहार न होकर उत्तराखंड की जीवनशैली का प्रतिबिंब है। यह प्रकृति के साथ संतुलन बनाये रखने वाला बहुत ही बेहतरीन त्योहार है। इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि,प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हमेशा से पहाड़ की परंपरा का अहम हिस्सा रहा है। हरियाली हर इंसान को खुशी प्रदान करती है। हरियाली देखकर इंसान का तन-मन प्रफुल्लित हो उठता है। इस त्योहार में व्यक्तिवादी मूल्यों की जगह समाजवादी मूल्यों को वरीयता दी गई है।सामाजिक सद्भाव और सहयोग का पर्व है हरेला।

हरेला के त्योहार में लोग अपने घर के हरेले (समृद्धि) को अपने तक ही सीमित न रखकर उसे अन्य लोगों को भी बांटते हैं। यह विशुद्ध रूप से सामाजिक सद्भभाव और प्रेम की अवधारणा है। हरेला के त्योहार में भौतिकवादी चीज़ों की जगह मानवीय गुणों को वरीयता दी गई है। मानवीय गुण हमेशा इंसान के साथ रहते हैं जबकि भौतिकवादी चीज़ें नष्ट हो जाती हैं।

वर्तमान समय में कई जगह, प्रकृति और मानव को परस्पर विरोधी के तौर पर भी देखा जाता है वहीं, हरेला का त्योहार मानव को प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने की सीख देता है। हरेला पर्व हरियाली और जीवन को बचाने का संदेश देता है। हरियाली के सर्वत्र पदार्पण से जीवन भी बचा रहेगा और सारे वातावरण में ख़ुशी का आलम रहेगा।अतः हम दावे के साथ कह सकते हैं कि,यह पर्व प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन को खासा अहमियत देता है।

इस त्योहार का एक और शानदार पहलू यह भी है कि हरेला पारिवारिक एकजुटता का पर्व भी है। संयुक्त परिवार चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो उसमें हरेला एक ही जगह बोया जाता है। आसपड़ोस और रिश्तेदारों के साथ ही परिवार के हर सदस्य चाहे वह घर से कितना भी दूर क्यों न हो ‘हरेला’ भेजा जाता है। यह त्योहार संयुक्त परिवार की व्यवस्था पर जोर देता है। संपत्ति के बंटवारे और विभाजन के बाद ही एक घर में दो भाई अलग-अलग हरेला बो सकते हैं। वैशाखी और होली की तरह ही यह एक कृषि प्रधान त्योहार है।

हरेला का पर्व ऋतु परिवर्तन का सूचक :

सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक महत्व के इस पर्व में हरेला को दसवें दिन काटा जाता है। वैशाखी और होली की तरह ही यह एक कृषि प्रधान त्योहार है। हरेले से नौ दिन पहले घर में स्थित पूजास्थल पर छोटी-छोटी डलिया में मिट्टी डालकर बीजों को बोया जाता है ताकि यह नौ दिन में लहलहा उठे। घर की महिलाएं या बड़े बुजुर्ग सांकेतिक रूप से इसकी गुड़ाई भी करते रहते हैं।

इसके बाद इसे काटकर विधिवत् पूजा-अर्चना कर देवताओं को चढ़ाया जाता है और फिर परिवार के सभी लोग हरेला के पत्तों को सिर और कान पर रखते हैं। हरेला के पत्तों को सिर और कान पर रखने के दौरान घर के बड़े बुजुर्ग, आकाश के समान ऊंचा, धरती के समान विशाल और दूब के समान विस्तार करने का आशीर्वाद सभी को देते हुए कहते हैं कि—
जी रया ,जागि रया ,

यो दिन बार, भेटने रया,

दुबक जस जड़ हैजो,

पात जस पौल हैजो,

स्यालक जस त्राण हैजो,

हिमालय में ह्यू छन तक,

गंगा में पाणी छन तक,

हरेला त्यार मानते रया,

जी रया जागी रया.

हरेला घर में सुख, समृद्धि व शान्ति के लिए बोया और काटा जाता है। हरेला अच्छी फसल का सूचक है, हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल,फसलों को नुकसान ना हो।

यह भी मान्यता है कि, जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे कृषि में उतना ही फायदा होगा। वैसे तो हरेला घर-घर में बोया जाता है, लेकिन किसी-किसी गांव में हरेला पर्व को सामूहिक रुप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी मनाया जाता हैं गाँव के सभी लोगों द्वारा एक साथ मिलकर मंदिर में हरेला बोया जाता है,और सभी लोगों द्वारा इस पर्व को उत्साह से मनाया जाता है।

श्रावण मास में मनाया जाने वाला हरेला बहुत ही खास है:

सावन का महीना हिन्दू धर्म में पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह महिना भगवान शिव को समर्पित है। और भगवान शिव को यह महीना अत्यधिक पसंद भी है। इसीलिए यह त्यौहार भी भगवान शिव परिवार को समर्पित है। और उत्तराखंड की भूमि को तो शिव भूमि (देवभूमि) ही कहा जाता है। क्योंकि भगवान शिव का निवास स्थान यहीं देवभूमि कैलाश (हिमालय) में ही है।इसीलिए श्रावण मास के हरेले में भगवान शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है। (शिव,माता पार्वती और भगवान गणेश) की मूर्तियां शुद्ध मिट्टी से बना कर उन्हें प्राकृतिक रंग से सजाया और संवारा जाता है। जिन्हें स्थानीय भाषा में डिकारे कहा जाता है हरेले के दिन इन मूर्तियों की पूजा- अर्चना हरेले से की जाती है। और इस पर्व को शिव पार्वती विवाह के रूप में भी मनाया जाता है।

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