‘‘उत्तराखण्ड में शिक्षा के वर्तमान स्वरूप में छेड़छाड़ के दूरगामी परिणाम‘‘

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अजयपाल सिंह रावत

यह सर्वविदित है कि उत्तराखण्ड शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रदेश रहा है। इस विशिष्ट महत्तता के कारण आज हमारे प्रदेश के देहरादून, मसूरी, नैनीताल आदि शहरों के दर्जनों स्कूलों में 70 से 80 प्रतिशत बच्चे या तो बाहरी राज्यों से है या विदेशों से है। यह हमारे प्रदेश के लिए बड़े संतोष व गौरव की बात है कि हमारे प्रदेश में देश-विदेश से बच्चे अपनी शिक्षा-दीक्षा लेने आते है। और यह बात हमें और भी गौरवान्वित करती है कि हमारे प्रदेश से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर कई ऐसे छात्र है जो आज भारत में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी शीर्ष स्थानों में रहकर अपने देश का राजनीतिक व प्रशासनिक प्रतिनिधित्व कर रहे है।

इस परिपेक्ष में हमें इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है और विगत तीन-चार वर्षों से जो सीबीएसई व राज्य बोर्ड की स्कूलों पर एनसीईआरटी की किताबों को लागू करने का दवाब बनाया जा रहा है, कहीं न कहीं यह दवाब हमें विरासत में मिली शिक्षा को ध्वस्त न कर दें। इसका मुख्य कारण एनसीईआरटी की पुस्तकों का समय-समय पर नवीनीकरण न होना व बाजार में पुस्तकों की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में न होना भी है। एनसीईआरटी की पुस्तकों को लागू करने का जो दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जो शैक्षणिक क्रिया-कलाप है उसकी स्थिति क्या है और एनसीईआरटी की पुस्तकों को लगाने के साथ-साथ यह जानना जरूरी है कि पढ़ाई-लिखाई का ग्राफ गिरा है या बढ़ा है, धरातल की सच्चाई से यह अनुभव ही नही होता बल्कि उभर कर सामने आता है कि ज्ञानार्जन की स्थिति मात्र बिगड़ी ही नहीं बल्कि गम्भीर रूप से डांबाडोल हुआ है। पूरे प्रदेश की स्थिति क्या है इसकी समुचित जानकारी नहीं, किंतु हमारे शहर कोटद्वार की प्राप्त जानकारी के अनुसार स्थिति अति दयनीय है।

इस प्रकार की बाध्यता से अध्यापक और बच्चों के मन में एक निराशा का भाव पैदा हुआ है। यहां तक कि अभिभावक भी पसोपेस में है। इससे बड़ी समस्या तब उभरकर सामने आयी है जब विभागीय निर्देशों से अधिकारी लोग स्कूलों में जाकर बच्चों के बैगों की जांच करते है। इस प्रकार की गतिविधियों से जहां अध्यापक और बच्चों के मन में एक कुंठित भाव पैदा हुआ हैैं वहीं शिक्षा जैसे पवित्र कार्य, उन गलत कार्यों की तरह उभर कर सामने आया है, जिनको समाज में गलत नजरों से देखा जाता है। इस तरह छापामारी के मामले समाचार पत्रों के माध्यम से समय-समय पर प्रकाशित होते रहते है। शिक्षा की पवित्रता व गरिमा को इस तरह के अविवेकपूर्ण निर्णयों से बनाए रखना आज के शिक्षक समाज के लिए बहुत बड़ी चुनौती हो गयी है और प्राप्त जानकारी के अनुसार आज बाहरी प्रदेशों के बच्चों का प्रदेश में शिक्षा ग्रहण करने की रूचि भी घटी है।

हम प्राइमरी स्तर की स्थिति पर गौर करे जहां पर मात्र 2 या 3 पुस्तकें ही कक्षावार है। जबकि कहा जाता है कि 5-6 वर्ष के बच्चों मे अपने आस-पास की वस्तुओं को आत्मसात करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। अब अनुकूल या प्रतिकूल वातावरण के आधार पर बच्चों के चारित्रिक विकास या गुण-दोषों के आधार पर विकास क्रिया शुरू होती है। किसी बाल वैज्ञानिक ने लिखा भी है कि नन्हे बच्चे उन लताओं (बेल) के समान होते है, जिन्हें जिस प्रकार की बढ़वार (वृद्धि) व आकार-प्रकार की स्थिति दिए गये आधार के ऊपर निर्भर करता है। अतः प्राथमिक शिक्षा वह ज्ञान पुंज है जिससे हर नागरिक का विकास होता है। इस तरह यदि प्राइमरी शिक्षा जो कि शिक्षा की बुनियाद कही जाती है और जिसके ऊपर उच्च शिक्षा की दीवार खड़ी होती है, ही कमजोर होगी तो स्वाभाविक ही हमारे बच्चों का आने वाला भविष्य स्वतः ही अंधकारमय हो जाएगा।

आज जो परिवेश हम उन्हें दे रहे है उन बाल-मन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि वे कल के कैसे नागरिक बनेंगे, यह सत्य आप और हम सभी जिम्मेदार लोगों के समाने आज ही पारिलिक्षित हो रहा है। मैं उत्तराखण्ड सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित कराना चाहता हूं कि इस उत्तराखण्ड को जो वरदान अंगे्रज दे कर गये व इस उत्तराखण्ड को एक शिक्षा का केन्द्र बना कर चले गये, कहीं इस तरह के दबाव व छापामारी हमें उससे भी महरूम न कर जाय, जो हमें वरदान स्वरूप मिला है और जब तक हम जागे वहीं काफी देर न हो चुकी हो। सरकार आज के परिवेश को सुन्दर और मनोहारी बनाए, ताकि देश व विदेश के लोग हमारे प्रदेश में अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए आते रहे और हमारे प्रदेश के लाखों लोगों की आजीविका भी इसी तरह से सुचारू रूप से चलती रहे और यह संदेश देश-विदेश में जाय कि उत्तराखण्ड आज भी शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी प्रदेश है।

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