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भारतवर्ष की असफलता

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सुरेंद्र देव गौड़

वर्तमान में धीरे धीरे भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियां दुनिया के सामने आ रही है। आजादी के बाद के दशकों में भारतवर्ष ने जीवन के विभिन्न आयामों में उत्तरोत्तर प्रगति की है। लेकिन प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकता तथा उपलब्धता के मध्य विशाल अंतराल नजर आ रहा है। यही हाल इस देश में स्वास्थ्य सेवाओं में परिलक्षित हो रहा है। इसके कारण क्या है? आवश्यकता तथा उपलब्धता के मध्य अंतराल क्यों हुआ? इस अंतराल के लिए किसको जिम्मेवार समझा जाए? मैंने अपने जीवन में कुछ सरकारी विभागों के साथ व्यवहार किया है जिसे मैं लोगों के सामने रखना चाहता हूं। इन व्यवहारों तथा उन पर आधारित अनुभवों के सहारे भारतवर्ष की व्यवस्था की कमजोरियों को समझना आसान हो जाएगा।

भारत का शिक्षा तंत्र : इस देश में शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा राज्य शिक्षा विभाग उत्तरदाई है। इसके अलावा कुछ अन्य भी विकल्प मौजूद हैं लेकिन मेरा लेन-देन इन दो विभागों से ही हुआ है। मुझे इन दोनों ही विभागों की कार्य प्रणाली को देखने, सुनने तथा समझने का सौभाग्य या दुर्भाग्य मिला। अपने व्यक्तिगत अनुभवों को सामने रखने से पहले मैं एक प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक के द्वारा किए गए सर्वे को आपके सामने लाना चाहूंगा। इस दैनिक ने महानगरों में आम जनों से पूछा था कि वे किस सरकारी विभाग को सर्वाधिक भ्रष्ट मानते हैं। सामान्यतः हमारे दिमाग में पुलिस विभाग ,राजस्व विभाग ,आयकर विभाग इत्यादि के नाम उभरते हैं लेकिन इस सर्वे के अनुसार लोगों ने शिक्षा विभाग को सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग घोषित किया था। इसका कारण संभवत यह है की आज शायद ही कोई नागरिक हो जिसका पाला इस विभाग से ना पड़ता हो । इस सर्वे के लिए उस प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक को बधाई मिलनी चाहिए तथा भ्रष्टों में प्रथम आने के लिए शिक्षा विभाग बधाई का पात्र।

शिक्षा विभाग के साथ मेरे बुरे अनुभवों का दौर 1984 से प्रारंभ होता है। मैं मूलतः उत्तराखंड का निवासी हूं लेकिन किन्ही कारणों से कुछ वर्ष मध्यप्रदेश में रहा और स्वभावतः वहां पढा। इस वर्ष देहरादून आगमन हुआ तथा सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने के लिए भटकना पड़ा। सरकारी स्कूलों में सुनने को मिला कि दूसरे राज्य से आने के कारण यहां दाखिला मुश्किल है। आश्चर्य होता है जिस देश में लाखों-करोड़ों विदेशी आसानी से बस जाते हैं तथा राशन कार्ड, आधार ,वोटर आईडी इत्यादि सब कुछ बनवाने में सफल हो जाते हैं वहां इसी देश के छात्र को दाखिला लेने के लिए भटकना पड़े तो यह आश्चर्य की ही बात है। बहुत प्रयासों के बाद तथा कई लोगों के पैर पकड़ने के पश्चात देहरादून स्थित डीएवी स्कूल में दाखिला प्राप्त किया। इस विद्यालय में विचित्र अनुभव हुए। सत्र प्रारंभ होने के कुछ दिनों बाद हिंदी के शिक्षक कक्षा में आए तथा उन्होंने अपने व्यक्तित्व के नकारात्मक तथा सकारात्मक पक्षो को छात्रों के सामने रखा तथा अगले दिन से अध्यापन कार्य प्रारंभ करने का आश्वासन दिया। लेकिन पूरे सत्र उनके दर्शन नहीं हुए तथा स्थानापन्न की व्यवस्था भी नहीं हो पाई। कुछ जानकार बच्चों का कहना था कि संभवत: उनका ट्रांसफर हो गया था । इसी कक्षा में गणित के शिक्षक से प्राप्त अनुभव भी मेरे लिए नयापन लिए हुए था। उनके बारे में सर्वविदित था कि वे सिलेबस बोर्ड परीक्षा होने से केवल कुछ दिन पहले ही समाप्त करते हैं। व्यावहारिक बुद्धि के धनी छात्र जानते थे कि ऐसा इसलिए किया जाता था जिससे छात्रों को उनके ढाबे के बारे में जानने की जरूरत महसूस हो। ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा की पढ़ाई मैंने गवर्नमेंट इंटर कॉलेज रुड़की से की। यहां बारहवीं कक्षा के अनुभव भी सिहरन पैदा करते हैं। भौतिकी के शिक्षक ने शायद ही कभी न्यूमेरिकल करवाया हो। रसायन शास्त्र के शिक्षक ने ऑर्गेनिक केमिस्ट्री एक दिन में, माफ करिएगा, एक कालांश में समाप्त कर दी थी। उस समय उत्तर प्रदेश बोर्ड के विद्यार्थी ऑर्गेनिक केमिस्ट्री पहली बार 12वीं कक्षा में ही पढ़ते थे। सामान्य ज्ञान में माहिर छात्रों ने एक दूसरे की तरफ देखा , मुस्कुराए, और बोले की ढाबे की ओर प्रस्थान करने का समय हो गया है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के इस प्रकार के व्यवहार शिक्षा विभाग के अधिकारियों की तरफ भी कुछ इशारा करते हैं।

लगभग एक वर्ष पूर्व देहरादून के एक स्कूल में छात्रा के शोषण की खबरें प्रतिष्ठित अखबारों में छपी थी। यह स्कूल सीबीएसई के द्वारा आठवीं कक्षा तक मान्यता प्राप्त था लेकिन वहां बारहवीं तक की कक्षाएं चलाई जा रही थी। क्या इसके लिए राज्य के शिक्षा विभाग अथवा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारी जिम्मेदार ना थे? क्या इन विभागों में किसी अधिकारी को दोषी समझा गया ?
कुछ वर्ष पूर्व देहरादून रुड़की हाईवे पर देहरादून से लगभग साठ किलोमीटर दूर स्थित एक स्कूल से बच्चे बारहवीं की बोर्ड परीक्षा देने के लिए देहरादून आए थे। वे परीक्षा केंद्र पर समय से 30 मिनट देर से पहुंचे थे क्योंकि मोहन्ड के पास रास्ता किसी दुर्घटना के कारण बंद हो गया था। मजबूरी में बस हरिद्वार होते हुए देहरादून पहुंची थी। क्या सीबीएसई के नियम इस बात की अनुमति देते हैं की परीक्षा केंद्र 60 या 70 किलोमीटर दूर दिया जाए? बच्चों की परीक्षा छूटी लेकिन बाद में उनके लिए विशेष परीक्षा का आयोजन करवाया गया। क्या इस मामले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की कोई लापरवाही थी? उस स्कूल को चलाने वाली संस्था के खिलाफ कोई कार्यवाही की गई? सीबीएसई ने जिन विद्वानों को जांच -पड़ताल के लिए निर्धारित किया था उन्होंने क्या रिपोर्ट दी थी? यदि जांच रिपोर्ट कहती है कि कुछ भी गड़बड़ नहीं था तो फिर ऐसी विषम स्थिति पैदा क्यों हुई थी ?यदि इस मामले में कोई भी दोषी नहीं था तो फिर बच्चे परीक्षा केंद्र तक समय पर क्यों नहीं पहुंच पाए? यदि गलती बच्चों की थी तो उनके लिए विशेष इंतजाम क्यों किए गए? क्या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों को गलत कामों को करने तथा जांच रिपोर्ट को रसातल में दबा देने के लिए सरकारी खजाने से वेतन मिलता है? आज भी सुविधा के नाम पर स्कूल बच्चों को कपड़े ,किताबें ,जूते इत्यादि बेचते हैं। स्वयं मैंने एक पब्लिक स्कूल में नौकरी करते हुए लगातार 10 वर्ष पुस्तक विक्रेता का अतिरिक्त भार संभाला। इस अतिरिक्त कार्य के लिए कोई भुगतान भी नहीं किया गया। एक तरह से यह बेगार प्रथा का अति उत्तम उदाहरण था। भारतीय संविधान में बेगार प्रथा अवैधानिक घोषित हो चुकी है लेकिन तथाकथित समाज हित में जगह-जगह भिन्न-भिन्न रूपों में आज भी प्रचलित है। यानी मेरे मौलिक अधिकारों का हनन किया गया। लेकिन राज्य शिक्षा विभाग तथा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों को कुछ पता ही नहीं होता। कभी-कभी लगता है कि ये अधिकारी धरती के निवासी है ही नहीं । ये अंतरिक्ष निवासी हैं तथा कभी-कभार मनुष्य जाति को दर्शन देने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं।ये सम्मानित अधिकारीगण अखबारों के लिए हवाई फायर करते हैं फोटो सेशन में हिस्सा लेते हैं तथा अंतर्ध्यान हो जाते हैं

एक बार मैंने पब्लिक स्कूलों में कर्मचारियों की सैलरी से संबंधित नियमों को जानने के लिए उत्तराखंड के शिक्षा विभाग से राइट टू इनफार्मेशन के अंतर्गत सूचना मांगी। प्रथम आवेदन का जवाब देते हुए बताया गया कि इस संदर्भ में किसी भी प्रकार का कोई कानून शिक्षा विभाग में उपलब्ध नहीं है। अपीलीय आरटीआई करने पर संबंधित अधिकारी ने उचित कानून उपलब्ध करवाया। कानून के हिसाब से पब्लिक स्कूलों के कर्मचारी को वही सैलरी व डीए इत्यादि मिलने चाहिए जो राज्य के स्कूलों के कर्मचारियों को उपलब्ध होते हैं। आरटीआई का जिक्र आने पर याद आया की इस अधिकार का प्रयोग करते समय एक अजीब अनुभव प्राप्त किया था जिसे सभी लोगों से बांटना उचित लगता है। मैंने जब भी किसी विभाग में आरटीआई का इस्तेमाल किया तो पहला जवाब हमेशा गलत ही मिला है। इसकी क्या वजह हो सकती है? क्या आरटीआई के अंतर्गत यह प्रावधान है कि पहली बार जवाब गलत ही देना है? क्या सरकारी कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण मिलता है? प्रथम बार में गलत जानकारी देना सरकारी कर्मचारी का मौलिक अधिकार कैसे हो सकता है ? सरकारी कर्मचारियों में इतना साहस क्यों और कैसे पैदा होता है की वे भारतवर्ष की संसद द्वारा पारित अधिनियम की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए प्रारंभ में गलत जवाब भेजना अपना अधिकार समझ बैठे हैं? आरटीआई के अंतर्गत सही जवाब देना सरकारी कर्मचारी का कानूनी दायित्व है या प्रश्न पूछने वाले नागरिक का दायित्व है कि वह हर हाल में सही जवाब निकलवा कर दिखाएं? भारतवर्ष की लोकतांत्रिक यात्रा में एक अजीबोगरीब पैटर्न दिखाई देता है जिसमें जनता के पक्ष में जब भी कोई कानून बनता है उसमें कोई ना कोई ऐसा प्रावधान डाल दिया जाता है जिससे उसका मकसद कमजोर पड़ जाता है तथा लंपट अधिकारियों की बल्ले-बल्ले हो जाती है।

इसी क्रम में मैंने अक्टूबर 2017 में सीबीएसई के क्षेत्रीय ऑफिस देहरादून में एक आरटीआई आवेदन किया। इस आवेदन में बहुत से प्रश्न थे लेकिन एक प्रश्न पब्लिक स्कूलों के कर्मचारियों के वेतन के बारे में था। क्षेत्रीय ऑफिस ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के बारे में आकाशीय ज्ञान उपलब्ध करवाया। इस आकाशीय ज्ञान के अनुसार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षा करवाने वाली संस्था मात्र है। इसका प्राइवेट स्कूल के मालिकों तथा कर्मचारियों के मध्य संबंधों से कोई लेना देना नहीं है। फिर सवाल उठता है कि हर तीन साल या पांच साल में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारी प्राइवेट स्कूलों में जांच पड़ताल के लिए तथाकथित एक- सदस्यीय या बहु-सदस्यीय पैनल भेजते हैं उसका मकसद क्या होता है? क्षेत्रीय ऑफिस से मिले ज्ञान के पश्चात मैंने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मुख्यालय दिल्ली में आरटीआई के अंतर्गत आवेदन दिया । यहां से मिली जानकारी के अनुसार प्राइवेट स्कूलों में कर्मचारी को वही वेतन मिलना चाहिए जो राज्य के स्कूलों के कर्मचारियों को मिलता है। जो भी व्यक्ति इस लेख को पढ़ें वे स्वयं निष्कर्ष निकाले की सीबीएसई रीजनल ऑफिस देहरादून के अधिकारी झूठी सूचना उपलब्ध करा रहे हैं या सीबीएसई दिल्ली के अधिकारी। एक ही सरकारी विभाग के अलग-अलग स्तर के अधिकारी अलग-अलग सूचना लिखित में उपलब्ध कराते हैं। क्या ऐसे अधिकारियों को समाज सेवा तथा ईमानदारी के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए? या फिर भारत में एक नए पुरस्कार की घोषणा होनी चाहिए जो इस प्रकार के अधिकारियों को मिलना चाहिए। रिटायरमेंट के पश्चात इस प्रकार के अधिकारी कई बार समाज सेवक बनने की नौटंकी करते हुए पाए जाते हैं। सोचता हूं, यदि करोड़ों की लॉटरी लग जाए तो मैं क्या करूंगा? मुझे” मुन्ना भाई: जिला शिक्षा अधिकारी” या फिर “मुन्ना भाई: रीजनल ऑफिसर,केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड” शीर्षक वाली फिल्म बनानी चाहिए।

उत्तराखंड का श्रम विभाग : प्राइवेट क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की वस्तु स्थिति के बारे में कुछ जानकारियां लेने तथा देने के लिए मैंने एक पत्र ,उप श्रम आयुक्त ,कुमाऊं क्षेत्र, हल्द्वानी को प्रेषित किया था। यह पत्र भूलवश कुमाऊं क्षेत्र के उप श्रम आयुक्त को प्रेषित किया गया था। मैं उन्हें धन्यवाद प्रेषित करूगा कि उन्होंने फिर भी पत्र का संज्ञान लिया और मुझे सूचित किया कि यह मामला उप श्रम आयुक्त, गढ़वाल क्षेत्र ,के क्षेत्राधिकार में आता है। उन्होंने मुझे उप श्रम आयुक्त गढ़वाल क्षेत्र से संपर्क करने की सलाह दी। इसके अलावा उन्होंने स्वत: ही मेरे द्वारा भेजे गए पत्र की एक कॉपी उप श्रम आयुक्त, गढ़वाल क्षेत्र, को प्रेषित करवा दी। उप श्रम आयुक्त ,कुमाऊं क्षेत्र, का पत्र मुझे मार्च 2018 में प्राप्त हुआ था। जब मैंने जून 2018 में उप श्रम आयुक्त, गढ़वाल क्षेत्र ,से संपर्क किया तो उनसे की गई मुलाकात मेरे लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक रही। उन्होंने उप श्रमायुक्त हल्द्वानी से किसी भी प्रकार के पत्र के मिलने के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की तथा मुझे सलाह दी कि मैं फलां -फलां महिला कर्मचारी के पास जाऊं तथा उनसे उस पत्र के बारे में जानकारी हासिल करूँ। यदि उन महिला कर्मचारी के पास वह पत्र उपलब्ध हो तो वह पत्र मैं लूॅ और उनके सामने अर्थात अधिकारी के सामने प्रस्तुत करूँ । यहां सोचने का विषय है कि क्या पत्र लिखने वाले या शिकायतकर्ता व्यक्ति को सरकारी विभागों में फाइल एक कर्मचारी से दूसरे कर्मचारी तक लाने ,ले जाने के लिए कहा जा सकता है? संबंधित अधिकारी के प्रशासनिक कौशल तथा अपरिमित ज्ञान के सामने बौनेपन का भाव महसूस करते हुए मैं अपने घर वापस चल पड़ा। आज लगभग दो वर्ष बीत चुके हैं लेकिन उस सड़क की तरफ देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा हूं जहां उप श्रम आयुक्त , गढ़वाल क्षेत्र, का विभाग मौजूद है।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन : मुझे एक संगठन में दिसंबर 1998 से कार्य करने का अवसर मिला। किसी वजह से संगठन ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की सदस्यता 2001 मैं ग्रहण की। जब मैंने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में इस अंतराल के संबंध में निवेदन किया तो इस संगठन के अधिकारियों ने त्वरित कार्यवाही करते हुए समस्या का निदान करवाया । लेकिन अब एक तकनीकी बात उठ खड़ी हुई है। मुझे इपीएफ का सदस्य कब से माना जाएगा? 2001 से या 1998 से? कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के विशेषज्ञ अधिकारियों के दिमाग में यह सवाल पैदा क्यों नहीं हुआ? यदि यह सवाल उत्पन्न होता तो उसके निराकरण की संभावना भी बनती। इस प्रकार के अनुभव बताते हैं कि भारतवर्ष में नागरिकों को पग-पग पर अपने अस्तित्व की परीक्षा देनी होती है। जब तक नागरिक प्रश्न नहीं उठाएगा तथा जूझने के लिए तैयार नही होगा सरकारी विभाग के अधिकारी निष्क्रिय पड़े रहेंगे। संभवत: उनकी शिक्षा अथवा प्रशिक्षण में कुछ खामियां है।

जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय, देहरादून : सन 2014 मैं उत्तराखंड सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने का फैसला किया था। इन चुनावों में एक पब्लिक स्कूल के कर्मचारियों को भी चुनाव ड्यूटी में तैनात किया गया। मेरी जानकारी के मुताबिक पब्लिक स्कूल के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने का कोई भी प्रावधान नहीं है। जब इस बात की शिकायत उपयुक्त कार्यालय में जाकर की गई तो संबंधित अधिकारियों ने घोषणा की कि वे किसी को भी इस प्रकार की ड्यूटी करने के लिए बाध्य कर सकते हैं। मैंने राइट टू इनफार्मेशन एक्ट 2005 का प्रयोग करते हुए जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय ,देहरादून में एक आवेदन दिया। इस आवेदन में पूछा गया था कि क्या पब्लिक स्कूल के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में लगाया जा सकता है? जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय, देहरादून से जो जवाब आया वह चौंकाने वाला था। इसके अनुसार पब्लिक स्कूल के किसी भी कर्मचारी को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने का कोई प्रावधान नहीं है, ना ही कभी लगाया गया है। जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से प्राप्त जानकारी तथा वस्तु स्थिति में फर्क था। अतः राइट टू इनफार्मेशन एक्ट का प्रयोग करते हुए एक अपीलीय आवेदन किया जिसका जवाब देने की आवश्यकता, संबंधित अधिकारियों ने ,महसूस नहीं की । जागरूक पाठक जानते हैं कि ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को राज्य के सूचना आयुक्त के पास निवेदन करना होता है जो मैंने किया। सूचना आयुक्त के सामने जिला मजिस्ट्रेट देहरादून के कर्मचारी मानने को तैयार ही नहीं हुए के प्राइवेट स्कूल के कर्मचारियों को ड्यूटी पर लगाया गया है। लेकिन जब मैंने अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किए तो उनका कहना था की विशेष परिस्थितियों में पब्लिक स्कूल के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर लगाया जा सकता है। सूचना आयुक्त का कहना था कि यदि ऐसा है तो उपयुक्त सरकारी आदेश दिखाया जाए। जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय, देहरादून के कर्मचारी अपने कथन के समर्थन में कोई भी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए ।

सरकारी संस्थाओं को समझने के लिए वैकल्पिक झरोखा : सुधी पाठक जानते हैं कि सरकारी (राज्य तथा केंद्रीय) नौकरियों के लिए प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर किया जाता है। परीक्षा केंद्र सरकारी तथा पब्लिक स्कूलों में बनाए जाते हैं। परीक्षा आयोजित करवाने वाली संस्थाएं( यूपीएससी, एसपीएससी, अधीनस्थ चयन आयोग, एसएससी ,मेडिकल के लिए पृथक एजेंसी, समूह ग के लिए अलग एजेंसी, दून मेडिकल कॉलेज ने भी एक एग्जाम करवाया इत्यादि ) परीक्षा केंद्रों पर अपने नियमों के पूर्ण क्रियान्वयन के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त करते हैं। कुछ परीक्षाओं में जिला प्रशासन प्रत्यक्ष तौर पर इन परीक्षाओं के सुचारू संचालन के लिए जिम्मेवार होता है। परीक्षा आयोजित करवाने वाली संस्थाओं द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि एक अर्थ में गोबर- गणेश साबित होते हैं। स्कूल के प्रधानाचार्य या प्रधानाचार्या परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं के दिशा निर्देशों को धता बताकर( वायु देवता तथा सूर्य देवता के सानिध्य एवं संरक्षण में) एक दिन में ही तीस हजार या चालीस हजार अथवा पचास हजार भारतीय रुपए हजम कर जाते या जाती है । अगर एक स्कूल में एक वर्ष में 20 परीक्षाएं आयोजित की जाएं तो कम से कम छह लाख भारतीय रुपए हजम। यदि एक सम्माननीय प्रधानाचार्य या प्रधानाचार्या पाच वर्ष तक पद पर रहे तो तीस लाख भारतीय रूपए का हजमी करण । इस प्रकार की हजमी करण प्रक्रिया खुलेआम चलती है लेकिन किसी को कुछ पता नहीं, आश्चर्य। इस लेख के मध्य में कहीं मैंने स्वयं से पूछा था कि यदि मेरी लॉटरी लग जाए तो मैं क्या करूंगा । उस प्रश्न का उत्तर पढ़कर ऐसा लगेगा कि मैं पुरुषों के खिलाफ हूं लेकिन ऐसा कतई नहीं है। स्त्री प्रधान फिल्म भी बन सकती है उदाहरण के लिए “मुन्नी बहन प्रधानाचार्या”।

भारतवर्ष की असफलताओं को सफलताओं में कैसे बदला जाए? शुरुआत में जिस आवश्यकता तथा उपलब्धता का जिक्र किया था उसे कैसे संतुलित किया जा सकता है? इसे करने के लिए सरकारी तंत्र की कमियों को शीघ्रता से समाप्त करने की आवश्यकता है। भारत के प्रधानमंत्री देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक ले जाना चाहते हैं। उनके विरोधी उनकी इस महत्वाकांक्षा पर कटाक्ष करते हैं परंतु यह संभव है। भारत की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन डॉलर हो चुकी होती यदि सरकारी तंत्र अक्षमता ,उदासीनता तथा चारित्रिक दुर्बलता से ग्रसित ना होता। मेरे विचार में सरकारी तंत्र एक अभिभावक की भांति है जिसे अनुशासित, चारित्रिक रूप से सबल तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में अग्रगामी होना ही चाहिए। यदि अभिभावक ऐसा नहीं होगा तो वह अपने बच्चों को सही दिशा देने में असफल हो जाएगा । प्राइवेट संस्थाओं से नियमों के अनुपालन कराने के लिए सरकारी तंत्र को स्वयं ठीक होना ही होगा । इंसानी समाज में इक्के- दुक्के उदाहरण मौजूद हैं जहां अभिभावक भ्रष्ट एवं पतित हुए लेकिन बच्चा बौद्धिक एवं अन्य प्रकार से उन्नति कर गया। राजनीति शास्त्र पढ़ने वाले छात्र रूसो के नाम से परिचित ही होंगे। उनके पिता हर प्रकार से निकृष्ट व्यक्ति थे। वे अपने लिए शराब तथा घटिया साहित्य रूसो से ही मंगवाते थे । जब वह शराब का सेवन करते थे तो रूसो उस साहित्य का वाचन करता था एवं उनके पिता ठहाके लगाते थे । बचपन के ऐसे वातावरण के बावजूद रूसो दार्शनिक बन सका। उसने बच्चों को सही शिक्षा कैसे दी जाए इसके ऊपर बाकायदा एक पुस्तक लिख डाली । लेकिन सामान्यतः बच्चे अपने माता पिता तथा समाज द्वारा उपलब्ध कराए गए नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक तथा भावनात्मक माहौल के अनुसार ही ढलते हैं। देश को सशक्त बनाने के लिए, वर्तमान प्रधानमंत्री जी के सपनों को पंख देने के लिए तथा नागरिकों को बेहतर जीवन देने के लिए सरकारी तंत्र को रूपांतरित होना ही होगा ।

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