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भारत में शिक्षा : पाठ्यक्रम तथा शिक्षा तंत्र

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भारतवर्ष में अक्सर शिक्षा में सुधार के बारे में धुआंधार बातें की जाती है। जब कभी भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आती है तो इस तरह की बातें अधिक तीव्रता तथा अधिक आवृत्ति से सुनाई देने लगती हैं। क्या वास्तव में इस देश में  विद्यालयी शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है? यदि है तो उन बिंदुओं को स्पष्टता से उभारा जाना चाहिए जहां सुधारों की जरूरत है। इस कार्य को शीघ्र- अति -शीघ्र किया  जाए तो उत्तम होगा।

मेरा मानना है कि भारतवर्ष में विद्यालयी शिक्षा में पाठ्यक्रम की एकरूपता स्थापित करना पहला लक्ष्य होना चाहिए। इस देश में अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड, आईसीएसई बोर्ड, सीबीएसई बोर्ड, ओपन बोर्ड तथा राज्यों के विविध बोर्ड चल रहे हैं। इन बोर्डों में  पाठ्यक्रम का अंतर मौजूद है। संघवाद के नाम पर विभिन्न राज्यों को अलग-अलग मूल्यों को पढ़ाने की आजादी नहीं दी जा सकती। पाठ्यक्रम में थोड़ा बहुत फर्क संभव है और  औचित्य पूर्ण है लेकिन उनसे प्राप्त होने  वाले मूल्य अलग- अलग नहीं हो सकते ।  पाठ्यक्रम की विभिन्नता होने के कारण बच्चों के बीच तुलना करना असंभव लगने लगता है। बच्चों के बौद्धिक कौशल तथा ज्ञान अर्जन के स्तर की तुलना केवल तब संभव हो सकती है जब उनके द्वारा पढ़ा गया पाठ्यक्रम   एक  जैसा हो। कम से कम बोर्ड परीक्षाओं का पाठ्यक्रम तो एक जैसा होना ही चाहिए | अन्य कक्षाओं में थोड़ा बहुत अंतर स्वीकार्य होना चाहिए। यह अंतर विभिन्न क्षेत्रों तथा विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विरासत , इतिहास तथा भूगोल के अंतर को रेखांकित करने के लिए आवश्यक लगता है।

पाठ्यक्रम में एकरूपता का अर्थ यह नहीं है कि घोड़े और गधे को एक जैसी ही घास खिलाई जाए । हम सभी जानते हैं कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 2019- 20 के शैक्षणिक सत्र में गणित विषय में विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता के आधार पर उन्हें दो वर्गों में बांटा। इस बंटवारे के  आधार पर कुछ बच्चों को  कठिन तथा  अन्य को आसान, पाठ्यक्रम तथा पेपर, उपलब्ध कराए गए। इस योजना को अन्य विषयों में भी लागू करने की आवश्यकता है। भारत में विद्यालयी शिक्षा के बारे में निर्णय लेने वाले बुद्धिजीवी अधिकारी शायद  मानते हैं कि केवल गणित विषय ही मुश्किल होता है |संभवत  निर्णय  कर्ताओं को अपने विद्यार्थी जीवन में गणित विषय मुश्किल लगा हो ।  जिससे वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे होंगे। परंतु वास्तविकता यह है हर विषय मुश्किल हो सकता है। अपने 20 वर्षों के अध्यापन अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि यदि बोर्ड परीक्षाओं की कॉपी सही मानकों के आधार पर जाची जाएं तो वास्तविक रिजल्ट बेहद शर्मनाक होगा । विशेषकर सरल समझे जाने वाले विषयों यथा हिंदी तथा अंग्रेजी का। यह बच्चे की पसंद, नापसंद तथा विविध बौद्धिक क्षमताओं पर निर्भर करता है। प्रत्येक विषय में सरल विकल्प उपलब्ध करने से औसत तथा उससे नीचे की बौद्धिक क्षमता वाले विद्यार्थियों को अधिक अभ्यास कराना संभव हो सकता है। इससे उनमें शिक्षा के प्रति आकर्षण पैदा किया जाना संभव है।

इस देश में विद्यालयी शिक्षा के मामले में एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर  बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है |फलतः वहां सुधार के बारे में सोचना भी मूर्खतापूर्ण लग सकता है। इस देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं  जो आवास सुविधा उपलब्ध कराते हैं। आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने वाले विद्यालयों को कुछ शर्तें मानने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए जिससे शहरों में जल वितरण तथा विद्युत वितरण पर अनावश्यक बोझ ना पड़े। केवल उन विद्यालयों को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने का अधिकार दिया जाना चाहिए जो अपनी आवश्यकता की विद्युत सोलर पैनल के माध्यम से पैदा कर सकें | इसके अलावा अपनी जल संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वर्षा के जल को एकत्रित करना उनके लिए आवश्यक होना चाहिए। यदि इस प्रकार के विद्यालय दो शर्तों को  पूरा करने को तैयार हों तभी उन्हें आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे शहर में बिजली तथा पानी की बेहतर उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सकता है। इससे आवासीय विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं वर्षा जल संरक्षण तथा सतत विद्युत जैसी संकल्पनायें जीवन भर के लिए व्यवहारिक रुप से सीख जाएंगे। इसके अलावा सभी बड़े विद्यालयों ( जहां हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हो) के लिए आवश्यक होना चाहिए कि उनके पास विद्यार्थियों को लाने ले जाने के लिए स्वयं की बस सुविधा उपलब्ध हो  जिससे सडक परिवहन पर अनावश्यक दबाव पैदा ना हो। इस बारे में सोच विचार कर कुछ नियम बनाए जा सकते हैं उदाहरण के लिए 3 किलोमीटर के दायरे में विद्यार्थी स्कूल तक स्वयं पहुंचे ,यदि चाहें तो ,या उनके परिवार के लोग उन्हें पहुंचाएं। इससे अधिक दूरी तय करने वाले विद्यार्थियों के लिए स्कूल बस सुविधा उपलब्ध कराएं जिससे विद्यार्थी को अन्य साधनों का उपयोग  करने के लिए बाध्य ना होना पड़े |

पब्लिक स्कूलों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए नियामक संस्थाओं द्वारा जो नियम निर्धारित किए गए हैं उन्हें व्यावहारिक बनाया  जाए। जो नियम या सेवा शर्तें अस्तित्व में है या तो उन्हें लागू किया जाए अन्यथा उनका उन्मूलन कर इस मामले को नियोक्ता तथा कर्मचारी के मध्य छोड़ दिया जाए। इस देश की कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका जिस जन कल्याणकारीअवधारणा का ढोंग रचते हैं उसके सपने आम जनता को दिखाना बंद किया जाए। विभिन्न राज्यों में तथा केंद्र में शिक्षा मंत्री सार्वजनिक रूप से महान घोषणाएं करते हैं लेकिन उनके द्वारा की गई घोषणाएं किन्ही गुप्त कारणों से हवा हवाई साबित होती हैं। क्या इस प्रकार की घोषणाएं मंत्री पद की गरिमा की मानहानि नहीं करते? क्या शिक्षा मंत्रियों तथा संबंधित अधिकारियों पर पद की मानहानि करने का मुकदमा बनता है?

प्रबुद्ध पाठक जानते हैं की पंचायती स्तर पर संबंधित जनप्रतिनिधियों के लिए आवश्यक है कि वे सरकार द्वारा प्रदत बजट तथा किए गए खर्च को पंचायत भवन की दीवार पर स्पष्ट रूप से लिखित में दिखाएं। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे ग्राम पंचायत के लोग स्वत: उपलब्ध धन तथा खर्च की तुलना कर सकें। इसी प्रकार प्रत्येक पब्लिक स्कूल पर एक बाध्यता होनी चाहिए कि वह छात्रों से प्राप्त होने वाली आय को स्पष्ट रूप से अपनी वेबसाइट पर दिखाएं। इसके अलावा इन स्कूलों को बाध्य किया जाना चाहिए कि वे अपने प्रत्येक कर्मचारी को दिए जाने वाले वेतन की जानकारी भी अपनी वेबसाइट पर दिखाएं।इन संस्थाओं को लाभ कमाने का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए लेकिन उसके बारे में एक स्पष्ट नियम हो कि वे कितने  प्रतिशत लाभ कमा सकते हैं। यह धंधा (मैं इसे धंधा ही कहूंगा )अधिक जोखिम का नहीं है फलतः  इसमें लाभ प्रतिशत भी अधिक नहीं होना चाहिए जबकि वस्तुस्थिति बिल्कुल विपरीत है। जब तक पब्लिक स्कूल ऐसा ना करें उनकी मान्यता को बढ़ाया ना जाए  या नए स्कूल को मान्यता  ही ना दी जाए। यदि विद्यालय प्रबंधन अपने आय और व्यय को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करेगा तो इससे देश की सुरक्षा को किसी भी प्रकार का खतरा पैदा नहीं होगा। बल्कि स्कूल प्रबंधन के प्रति साधारण जनों में सम्मान का भाव पैदा होगा।

कोरोना जनित बीमारी ने पब्लिक स्कूलों के कर्मचारियों के लिए आर्थिक आपातकाल पैदा कर दिया है। केवल वे कर्मचारी सम्मान से जी पा रहे हैं जो ट्यूशन जैसे धंधे पर जीते हैं या अन्य साधनों से समानांतर आय प्राप्त कर सकते हैं। जो कर्मचारी पूर्णतया पब्लिक स्कूल से प्राप्त वेतन पर निर्भर हैं उनके अस्तित्व   तथा सम्मान पर भीषण संकट आ चुका है। अभिभावक फीस ना दे  तो वेतन नहीं मिलेगा यह तार्किक रूप से तो औचित्य पूर्ण लग सकता है लेकिन इस तर्क  में नियोक्ताओं का कपट पूर्ण व्यवहार तथा दर्शन छिपा हुआ है । इस देश में कई संस्थाएं ट्रस्ट के नाम पर चलती हैं। इन संस्थाओं ने पिछले कई वर्षों में अपने द्वारा संचालित स्कूलों से करोड़ों रुपए कमाए होंगे | वह धन कहां खपा दिया गया है? क्या उस धन से अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं मिल सकता था? जिन स्कूलों में अभिभावकों ने फीस जमा भी की है क्या वहां के कर्मचारियों को सामान्य समय की तरह वेतन मिल रहा है? क्या कोई संस्था है जो इसके बारे में जांच-पड़ताल कर सके ? पढ़ा लिखा होने के कारण इन स्कूलों में कार्यरत कर्मचारी सड़क पर आकर नंगा नाच करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं जिसका फायदा नियोक्ताओं तथा  सरकारों को मिलता है ।

भारतवर्ष के शिक्षा तंत्र में राज्यों को प्राप्त स्वायत्तता का जबरदस्त प्रमाण देखने को मिला है। देश के सर्वोच्च न्यायालय में CBSE की बोर्ड परीक्षाएं टलवाने के लिए एक मुकदमा चल रहा था | कई राज्यों ने शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त स्वायत्तता का फायदा उठाते हुए अपने यहां  बोड परीक्षाएं निरस्त कर दीं तथा अन्य विकल्पों के आधार पर छात्रों को प्रोन्नत करने का तरीका ढूंढ लिया | उत्तराखंड की सरकार ने कोविड-19 की स्थिति में भी बोर्ड परीक्षा करवाने का दुस्साहस दिखाया| संघवाद के नाम पर यह स्थिति दयनीय नजर आती है| मेडिकल आपात जैसी समस्या के सामने राज्य सरकारें तथा केंद्र सरकार भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाते हुए दिखाई दीं| तथा सर्वोच्च न्यायालय किसी और ही तल पर कार्य करता हुआ दिखाई दिया| हमारे राज्य के शिक्षा विभाग के अधिकारी तथा मंत्री साहब शिक्षकों को बारंबार नए-नए तरीके ढूंढने के लिए प्रेरित करते हुए दिखाई देते हैं| काश शिक्षा मंत्री तथा शिक्षा विभाग के अधिकारी गण भी कुछ नया सोच पाने की सामर्थ्य रखते| एक विपदा के समय वे लकीर के फकीर निकले | केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने स्वास्थ्य आपातकाल के चलते जुलाई के महीने(7 जुलाई) में पाठ्यक्रम में कुछ बदलाव किया। इस बदलाव को देखकर लगता है की निर्णय लेने वालों मैं स्पष्ट निर्णय क्षमता का नितांत अभाव है। जितने समय का नुकसान हुआ है तथा तथाकथित ऑनलाइन पढ़ाई मैं जो संसाधन उपलब्ध हैं उसके चलते शिक्षकों के लिए अध्यापन कार्य बेहद मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में हर कक्षा में कुछ अध्याय पूरी तरह कम किए जा सकते हैं । इन्हें कम कर देने से छात्र की विषय पर पकड़ ढीली नहीं  होगी। लेकिन निर्णय लेने वाले संभवत है घबराते हैं। इस देश में निर्णय लेने वाला अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता। आजकल हर आदमी, हर नेता, हर मंत्री मोदी जी के सहारे जी रहा है। सीबीएसई ने कक्षा 12 के अर्थशास्त्र विषय के पाठ्यक्रम में जो काट छांट की है वह अपर्याप्त है । मैं स्वयं एक पब्लिक स्कूल में अर्थशास्त्र का शिक्षक हूं हूं अतः पूरे भरोसे के साथ यह बात कह सकता हूं।

भारत में केंद्र तथा राज्य के शिक्षा मंत्रियों तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मर्यादा को बचाए रखने के लिए एक नए कानून की आवश्यकता है |इस कानून के द्वारा शिक्षा मंत्री तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों को प्राइवेट क्षेत्र के स्कूलो, कॉलेजों तथा अन्य संस्थाओं में जाने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए | कभी जाना भी हो  तो जांच पड़ताल के लिए जाना चाहिए  तथा  उस जांच पड़ताल  की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए । कारण ?अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक अपराधी के द्वारा 8 पुलिस वाले शहीद कर दिए गए| इसका कारण सभी जानते हैं| पुलिस विभाग के ही कुछ लोग इस अपराधी के साथ मिले हुए थे| सभी को सोचना चाहिए कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों तथा मंत्रियों तथा  प्राइवेट शिक्षा माफियाओं के घालमेल से कितना अपराध होता होगा |प्राइवेट शिक्षा संस्थान के कितने कर्मचारी इस घालमेल के शिकार बनते होंगे?

किसी भी राष्ट्र के सम्यक विकास के लिए मजबूत सैन्य बल, सशक्त अर्थव्यवस्था तथा विशालकाय वैज्ञानिक तंत्र की आवश्यकता होती है। परंतु इन सभी को मजबूती देने के लिए शानदार शिक्षा व्यवस्था तथा  सक्षम स्वास्थ्य व्यवस्था का होना आधारशिला का काम करता है। यदि आधारशिला ही कमजोर होगी तो उसके ऊपर खड़ी की गई संरचनाएं टिकाऊ नहीं हो सकतीं| अत: देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर सम्यक विचार विमर्श की आवश्यकता जान पड़ती है।

 

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