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मर्यादित आचरण

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सुरेंद्र देव गौड़

बचपन में विज्ञान की पुस्तकों में पढ़ा था कि संसार की प्रत्येक वस्तु अणुओं से सृजित है। शनैः- 2 पता चला कि अणु परमाणुओं से मिलकर बनता है। उच्चतर माध्यमिक कक्षा तक पहुंच कर पता चला कि  परमाणु न्यूट्रॉन ,प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन के संयोजन से बनते हैं। इंजीनियरिंग की अधूरी पढ़ाई तक पता चला की वस्तुतः संसार की उत्पत्ति संक्रमणीय चीज  से हुई है जो तरंग व कण दोनों के गुण रखती है। खैर ब्रह्मांड की उत्पत्ति वैज्ञानिक मनीषा के अनुसार स्थूल से ही हुई है। इस दृष्टिकोण में  नैतिकता या अनैतिकता  जैसे  मूल्यों का हस्तक्षेप नहीं होता है।

इसके विपरीत भारतीय दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति ध्वनि से हुई है तथा चेतन इसका गुण है। चेतन स्वयं को अर्ध  -चेतन तथा अचेतन के स्तरों तक ले जाता है। इस प्रक्रिया में पदार्थ की उत्पत्ति होती है। ऐसे दृष्टिकोण में मानव व्यवहार को नैतिकता तथा अनैतिकता जैसे मूल्यों के मापदंडों से नापा व तोला जाता है।

मैं अपने अस्तित्व के प्रत्येक स्तर से स्वयं को भारतीय मनीषा के निकट पाता हूं। यद्यपि मुझे भारतीय दर्शन अथवा अधुनातन विज्ञान की अतल

गहराइयों का अनुभव नहीं है। भारतीय दर्शन मानव इतिहास को लाखो वर्ष पीछे तक ले जाता है  भले ही इस दावे को वैज्ञानिक प्रमाणिकता का धरातल प्राप्त नहीं है। इस दावे के अनुसार मानव का इतिहास सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग तथा वर्तमान कलियुग में बांटा गया है। कोविड-19 जनित लॉक डाउन में सरकार ने रामायण तथा महाभारत का पुनः प्रसारण किया जो स्वागत योग्य निर्णय था। इन धारावाहिकों के माध्यम से दर्शकों को पुरातन मूल्यों का ज्ञान हुआ होगा। नकारात्मकता तथा स्वार्थ पर आधारित विचार उस समय भी प्रबल थे तथापि उस समय के महापुरुषों ने कुछ सनातन मूल्यों को बारंबार उद्धृत किया यथा; शब्दों तथा वक्तव्यों की मर्यादा, मुख निर्गत वाक्यों की प्राण प्रण से रक्षा, व्यक्तिगत तथा पारिवारिक हितों के विपरीत सामाजिक तथा राष्ट्रीय हितों को प्रमुखता……. इत्यादि।

लेख के प्रारंभ में विज्ञान ,दर्शन ,नैतिकता

 इत्यादि में परिभ्रमण करने का तात्पर्य क्या हो सकता है? लेखक भारतवर्ष के एक छोटे से राज्य -क्षेत्रफल व जनसंख्या के हिसाब से अन्यथा नहीं -का निवासी है। उसे वर्तमान माननीय शिक्षा मंत्री के कार्य व्यवहार ,नीतियों व नेतृत्व क्षमता को अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लेखक का अनुभव सोशल मीडिया तथा दैनिक पत्रों में छपने वाले लेख इत्यादि हैं। क्योंकि उसे माननीय के अंतर तम में झांकने की विद्या नहीं आती न ही वह लोहआवरण से आच्छादित विभागीय कार्यप्रणाली को प्रत्यक्ष देखने की क्षमता रखता है।

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए लेखक कुछ तथ्यों को प्रस्तुत करना चाहता है। माननीय मंत्री जी ने सरकारी शिक्षकों को वस्त्र संहिता से अनुशासित करने का प्रयास किया। इस प्रयास का परिणाम अज्ञात है। इसी प्रकार माननीय ने व्यक्तिगत विद्यालयों में पुस्तकों ,कपड़ों ,जूतों इत्यादि की व्यावसायिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करने की सार्वजनिक घोषणा की जो असफल साबित हुई। माननीय मंत्री जी के अति योग्य अधिकारियों ने सिंह गर्जना की कि मानकों के अनुसार वेतन ना देने वाले व्यक्तिगत स्कूलों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी। घोषणा का परिणाम अज्ञात है।

उपरोक्त घोषणाओं तथा घोषणाओं की दुर्दशा से निष्कर्ष निकलता है कि माननीय मंत्री तथा उनके योग्य अधिकारियों को पता ही नहीं की वह किस व्यवस्था के शिखर पर बैठे हैं। उन्हें नहीं मालूम राज्य में बिना मान्यता के स्कूल चलते हैं। विद्यालय मान्यता कक्षा 5 तक की लेते हैं तथा कक्षाएं माध्यमिक स्तर तक की चलाते हैं। ऐसे मंत्री तथा अधिकारी जिनकी घोषणाओं तथा कर्मों में  सुर ताल का अभाव है उनका होना या ना होना क्या? क्या ऐसे लोगों को सोच समझकर नहीं बोलना चाहिए? जिन कार्यों को करवाने की क्षमता नहीं उनकी सार्वजनिक उद् घोषणा मूर्खतापूर्ण कृत्य है या नहीं? मंत्री महोदय तथा उनके योग्य अधिकारियों के दंभ पूर्ण आदेश प्रिंट मीडिया में छपते हैं। कुछ पत्र पत्रिकाएं इन घोषणाओं को ऐसी क्रांतिकारी भाषा में लिखते हैं के वे पके आम की भांति लगती है! प्रभावित व्यक्ति निकट आए तोड़े तथा चूस ले! कई बार तो लगा की व्यक्तिगत विद्यालयों के कर्मचारियों का अभागा भाग्य उत्थान के मार्ग पर है। लेकिन? माननीय मंत्री जी तथा उनके योग्य अधिकारियों के अखबारी शंखनाद अनंत ब्रह्मांड की यात्रा पर निकल जाते हैं।

लेखक के लिए ह्रदय विदारक यह है कि माननीय मंत्री जिस विचारधारा तथा राजनैतिक दल का प्रकटीकरण है वह सतयुग  त्रेता युग तथा द्वापर युग के महापुरुषों से अथाह प्रेरणा लेते हैं। उस युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करने का वायदा किया जाता है। संभवत यह राजनीतिक दल विश्व का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है। एक अन्य चिंता यह भी है कि लेखक स्वयं विचारधारा के उस वटवृक्ष के नीचे शरणागत होता है। वह प्रतिद्वंदी दलों के समर्थकों के सामने ही पराभव का एहसास नहीं करता बल्कि अंतरतम की लौ से भी लुक छुप कर जीता है। राज्य के माननीय मंत्री जी तथा महा ज्ञानी अधिकारियों से विनम्र निवेदन है की निवाला उतना ही ले जितना सौम्यता से चबा सके। अखबारों मैं बड़े-बड़े वक्तव्य देकर व्यक्तित्व के अंधकार पक्ष को सार्वजनिक ना करें।

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