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विद्यार्थियों पर शिक्षा-प्रणाली का बोझ

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भारत देश अपनी विभिन्न संस्कृति और विशाल आबादी के लिए काफी प्रसिद्ध है। जिस तरह लोगों की संख्या काफी ज्यादा है, उसी तरह उनकी दिक्कत और परेशानिया भी ज्यादा है। भारत इस विशाल जनजाति के होने से कई दिक्कतों से जूझ रहा है, जैसे गरीबी, बेरोजगारी, विद्या हीनता एवं अपराध। इन समस्याओ से लड़ने के लिए, भारत सरकार ने कई सारी नीतिया और योजनाए बनाई है। लेकिन अभी तक एक भी कारगर समाधान नहीं मिल पाया है, जो की इन समस्याओ से निजाद दिला सके।

आज के दौर में सिर्फ शिक्षित होना ही काफी नहीं है, आपको बुद्धिमान से भी उतना ही तेज होना पड़ेगा और समाज के साथ अपने आप में सुधार करते रहना पड़ेगा। जैसे-जैसे समय आगे बड़ रहा है, विज्ञानं प्रगति कर रहा है। हर मनुष्य को जरूरत है कि वो अपना और अपनी बुद्धि का विकास, समय के साथ करता रहे। अन्यथा वो मनुष्य उसी समय में फसा रह जयगा और बाकी दुनिया आगे निकल जयगी।

आपने कई बार कोई अच्छी डिग्री वाला मनुष्य को अपनी डिग्री के प्रतिकूल जॉब करते हुए देखा होगा। इसके कई सारे कारण हो सकते है लेकिन मुझे जो सबसे बड़ा कारण लगता है, वो है भारत की शिक्षा प्रणाली। ASAR के मुताबिक 83% भारतीय रोजगार के योग्य, कुशल नहीं है। यहां तक की भारत का नाम उचा करने वाले सुन्दर पिछाई और सत्य नडेला ने भी अपनी आगे की शिक्षा-दीक्षा, विदेश से करी थी।

अपने देश में योग्य पूर्ण लोग बहुत है, लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली उनके अंदर की प्रतिभा को मार देती है। हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ नम्बरो पर आधारित है। जितने ज्यादा आपके नंबर, उतने ज्यादा आप होशियार, चाहे आपको कुछ समझ आया हो या न आया हो। कुछ नई सोच वालो पर हसा जाता है, और उनकी काबिलियतों को वही कुचल दिया जाता है। पूरी दुनिया में बदलाव हो रहा है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसा कुछ ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिला है।

हर व्यक्ति की काबिलियत एक दुसरे से अलग होती है, और काबिलियतों का स्तर भी अलग होता है। तो फिर हर अलग व्यक्ति के लिए एक सामान शिक्षा क्यों? अब मछली जल की ही रानी होती है, भूमि की नहीं और घोडा भूमि पर ही तेज दौड़ सकता है, जल में नहीं। इसी तरह हर इंसान का दिमाग भी अलग अलग तरीके से काम करता है। और हर किसी की रूचि में भी भिन्नता देखने को मिलती है। हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ दिमाग में शिक्षा भरने का काम करती है, और उसका वास्तविक जीवन में उपयोग कहाँ होगा, यह बात किसी को नहीं पता। क्या,आपको पता है गणित के सारे फॉर्मूले जो अपने स्कूल में सीखे है, उनका आप कहां उपयोग करेंगे अपने वास्तविक जीवन में? या फिर केमिस्ट्री (रसायन विज्ञानं) के कितने रिएक्शन का आज, आप उपयोग कर पा रहे है? किसी को नहीं पता।

भारत में अनगिनत इंग्लिश स्कूल है, लेकिन बहुत कम ही ऐसे लोग मिलेंगे जो बेधड़क इंग्लिश बोल सके और उन लोगो ने भी इस कौशल को खुद की मेहनत और लगन से सीखा और सराहा होगा। तो सोचिये जब दो ढाई साल का बच्चा बोलना सीख जाता है, सिर्फ अपने माता पिता या फिर अपने आस पास के माहोल को देखकर चाहे वो कुछ शब्द हो या फिर हो पूरी भाषा। तो विद्यार्थियों के अंदर क्या कमी रह जाती है? यह गलती विद्यार्थियों की नहीं स्कूलो की शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था की है, जो बच्चो की सोचने और समझने की क्षमता कम कर देती है। कुछ दोष तो माता-पिता को भी दिया जा सकता है, जो अपने बच्चो की रूचि और काबिलियत जाने बिना, उन्हें उनकी काबिलियत के विपरीत क्षेत्र में धकेल देते है। हर माँ-बाप का अपने बच्चो को लेकर काफी बड़े सपने होते है। लेकिन आप सिर्फ अपने सपनो की पूर्ति के लिए, अपने बच्चे की प्रतिभा को नहीं मार सकते। लेकिन हम सारा इल्ज़ाम माँ-बाप पर नहीं डाल सकते है, क्यूंकि माँ-बाप सिर्फ अपने बच्चो का भला ही चाहते है, इसलिए वह अपने बच्चो को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने की पूरी कोशिश करते है, जिससे उनका भविष्य उज्जवल हो सके।

परन्तु भारत के ज्यादातर स्कूल सिर्फ बिज़नेस के लिए ही खुले हुए है। स्कूल का काम होता है बच्चो का सही मार्गदर्शन करना एवं उनकी बुद्धि का विस्तार करना। और इसके विपरीत, आज कल स्कूल सिर्फ फीस बढ़ाते है,अलग-अलग यूनिफार्म और बुक के ज़रिये हर साल पैसे कमाते है, एवं हर कार्यकर्म के द्वारा पैसे ठगने का कार्य करते है।

हमारे देश में शिक्षा का क्षेत्र काफी छोटा है। यहाँ ज्यादातर आपके पास तीन विकल्प होते है – साइंस (विज्ञान), कॉमर्स (वाणिज्य) और आर्ट्स (कला)। और जो विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों को योग्य और अत्यदिक आय कमाने वाला विद्यार्थी माना जाता है, जिसे चुनकर बच्चे डॉक्टर, साइंटिस्ट और इंजीनियर जैसे व्यवसायों में अपना भविष्य बना सकते है। लेकिन बच्चो के लिए स्कूल में पढ़ाया हुआ ही काफी नहीं होता, उन्हें अलग से टूशन लगा के भी पढ़ना पड़ता है। और फिर भी कुछ बच्चो को परीक्षा पास करने में परेशानी होती है। क्यूंकि पढ़ाई को पढ़ाई की तरह नहीं बल्कि एक बोझ की तरह उनके ऊपर लाध दिया जाता है। पहले स्कूल, फिर टूशन और फिर घर में पढ़ाई, तो आप खुद ही सोचिये दिमाग कितना थक जाता होगा। हर मनुष्य के लिए पड़ना आवश्यक है, लेकिन उसी के साथ आराम करना और खुद के लिए समय निकलना भी आवश्यक है।

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