सुप्रीम कोर्ट ने ईसाइयों पर हमले संबंधी याचिका पर गृह मंत्रालय से कहा, 8 राज्यों से रिपोर्ट मांगें

सुप्रीम कोर्ट ने ईसाइयों पर हमले संबंधी याचिका पर गृह मंत्रालय से कहा, 8 राज्यों से रिपोर्ट मांगें
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सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई समुदाय पर हमले के आरोप वाली याचिका पर गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय से बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से सत्यापन रिपोर्ट मांगने को कहा। शीर्ष अदालत ने पूरी कवायद करने के लिए दो महीने का समय दिया, जिसमें प्राथमिकी दर्ज करना, गिरफ्तारियां, जांच की स्थिति और दायर आरोप पत्र शामिल हैं। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और हिमा कोहली ने कहा कि, हम याचिका में लगाए गए आरोपों की सत्यता पर एक राय नहीं बना सकते। पीठ ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करना बेहतर होगा।
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि ईसाइयों की 700 प्रार्थना सभाओं को रोक दिया गया और उनके खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल किया गया। केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सत्यापन पर एमएचए ने पाया कि याचिका में सांप्रदायिक हमलों के रूप में संदर्भित कई घटनाएं या तो झूठी या अतिरंजित पाई गईं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि देश में ईसाइयों पर बढ़ते हमलों का आरोप लगाने वाली याचिका में कोई दम नहीं है।
केंद्र ने कहा कि इस तरह की भ्रामक याचिकाएं पूरे देश में अशांति पैदा करती हैं और शायद देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए देश के बाहर से सहायता प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।
एमएचए ने एक लिखित जवाब में कहा, इस तरह की भ्रामक याचिकाएं दायर करने, पूरे देश में अशांति पैदा करने और शायद हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए देश के बाहर से सहायता प्राप्त करने की कोशिश छिपा हुआ एजेंडा प्रतीत होता है। मंत्रालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने झूठे और स्वयं के बनाए दस्तावेजों का सहारा लिया है और प्रेस रिपोर्टों का भी हवाला दिया है, जहां ईसाई उत्पीडऩ को गलत तरीके से पेश किया गया है।
एमएचए की प्रतिक्रिया देशभर में ईसाई संस्थानों और पुजारियों पर हमलों की बढ़ती संख्या और घृणा अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए इसके दिशानिर्देशों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर आई है। याचिकाकर्ता रेव पीटर मचाडो और अन्य ने 2018 में तहसीन पूनावाला मामले के फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को लागू करने की मांग की।

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