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भारत दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता, चीन को दे सकता है टक्कर

भारत दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता, चीन को दे सकता है टक्कर
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 भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे अधिक मोबाइल फोन बनाने वाला देश बन चुका है। हाल में सरकार ने जो प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम की घोषणा की है, उससे आने वाले वर्षों में हम ऑटोमोबाइल कंपोनेंट, मेडिकल डिवाइस, सेमीकंडक्टर, टेलीकॉम उपकरण, सोलर मॉड्यूल और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी के मामले में भी चीन को टक्कर देने की स्थिति में आ सकते हैं। दरअसल, भारत विश्व पटल पर मैन्युफैक्चरिंग में चीन की जगह लेता जा रहा है। चीन में मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती लागत, ताइवान के साथ संबंधों में तनाव और कोविड-19 के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति के कारण सप्लाई चेन में दिक्कतें आने से अनेक देश और उनकी कंपनियां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी पर निर्भरता कम करना चाहती हैं। इस बदलते माहौल में भारत उनका नया ठिकाना बन रहा है। हाल के दिनों में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में निवेश की घोषणा की है, कुछ ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। जैसे, फॉक्सकॉन और वेदांता ने 1.5 लाख करोड़ रुपये की लागत से चिप प्लांट लगाने का ऐलान किया है। पहले से मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर चुकीं सैमसंग और एपल जैसी कंपनियां अब विस्तार योजना पर काम कर रही हैं। लेकिन अब भी कई ऐसे इंडस्ट्री सेक्टर हैं जिनमें निवेश की काफी गुंजाइश है। इससे न सिर्फ आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि निर्यात बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इस लेख में विशेषज्ञों के हवाले से हम बता रहे हैं कि वे सेक्टर कौन से हैं, उनमें निवेश में क्या अड़चनें हैं और उनका समाधान क्या है। निर्यातकों के संगठन फियो (FIEO) के महानिदेशक और सीईओ डॉ. अजय सहाय ने जागरण प्राइम से बातचीत में कहा, “यह बात तब भी आई थी जब रूस और अमेरिका के बीच 2018 में टैरिफ युद्ध शुरू हुआ था। उस समय सबसे ज्यादा फायदा वियतनाम को मिला। लेकिन निवेश जुटाने में वियतनाम की एक सीमा है। इस बार ताइवान की वजह से दुनिया में चीन विरोधी सेंटिमेंट काफी मुखर है। एशिया-प्रशांत देशों की कंपनियां या तो चीन से अपना निवेश निकाल रही हैं या वहां नया निवेश नहीं करना चाहती हैं।” एनआईटी जालंधर के चेयरमैन और पूर्व फियो प्रेसिडेंट एस.सी. रल्हन भी कहते हैं, “भारत के लिए आगे बढ़ने का यह सही समय है। चाहे अमेरिकी निवेशक हों या यूरोपीय, वे चीन नहीं जाना चाहते। वे भारत, ताइवान, कंबोडिया जैसे देशों की तरफ देख रहे हैं।” एसबीआई रिसर्च ने हाल ही एक रिपोर्ट में कहा है कि चीन में नया निवेश कम होने का भारत को फायदा मिल सकता है।

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