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दुविधा में मजदूर

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उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पंजाब से पैदल अपने गृह राज्य बिहार लौट रहे मजदूरों को एक शराब के नशे मे धुत्त बस चालक ने बुरी तरह से कुचल डाला जिसमें छः लोगों की मौत हो गई है जबकि पांच लोग गम्भीर हालात में अस्पताल मे भर्ती कराये गये है. वहीं कुछ ही दिन पहले मजदूरों का एक जत्था जब पैदल ही अपने गृह क्षेत्र को लौट रहा था तो भूख और प्यास से बेहाल ये मजदूर तथा उनके बच्चे थके मांदे रेल की पटरियों पर ही सो गये मजदूरों के साथ जिंदा बचे उनके साथियों ने जो कि पटरियों से बाहर सो रहे थे कि उन्हे लगा कि लाॅक डाउन के चलते भारतीय रेलवे ने भी अपने रूटों पर सभी प्रकार की सेवाओं को निरस्त कर रखा है, कम पढे लिखे होने के चलते मजदूर यह नही समझ पाये कि रेलवे की माल गाड़ियां तो कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने की खातिर सरकार द्वारा लागू लाॅकडाउन के दौरान अपने माल ढुलाई के काम में लगी हुई हैं और इसी गलतफहमी के चलते ये भूख प्यास तथा लम्बीं दूरी की लगातार अनथक पैदल यात्रा से थके मांदे रेल लाइन पर ही पटरी के ऊपर अपने बच्चों सहित सो गये और उन असहाय निरीह मजदूरों को पलक झपकाने का मौका भी नही मिला था कि उनके चीथड़े उड़ाती ट्रेन उनके ऊपर से गुजर गई जिसकी चपेट मे आने से कई मजदूर और उनके मासूम बच्चे मारे गये. अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर मजदूरों के इस अपने कार्यक्षेत्र से अपने गृहक्षेत्रों की ओर देशव्यापी पलायन और इस भगदड़ जैसी हालात के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, वह भी तब जब केन्द्र सरकार तथा राज्यों की सरकारें लगातार मजदूरों से निवेदन कर रही है कि वे यथास्थान पर रहें तथा उन्हें हर प्रकार की सुविधा और उनके खाने पीने की आवश्यक्ताओं की सामग्री उन तक पंहुचाई जायेगी लेकिन यहां एक बड़ी कमी अनचाहे ही सहो हो गयी. असल मे ये अधिकांश मजदूर अधिक पढे लिखे नही है तथा सरकार और प्रशासन के माध्यम से जारी हो रहे निर्देशों मे इन तक वांछित सूचना पंहुच नही पा रही हैं और अगर किसी माध्यम से सूचनाओं को इन कम पढ़े लिखे मजदूरों तक पंहुचाया भी जा रहा है या तो उन्हें इन निर्देशों को सही ढंग से समझाया नही जा रहा है अथवा ये कम पढ़े लिखे मजदूर समझ नही पा रहे हैं, और इस अनिश्चितता पूर्ण माहौल में बिहार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड आदि राज्यों के कई मजदूर कभी कंटेनरों मे तो कभी किसी ट्रक आदि वाहनों मे छिपकर तो हजारों मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर अपने घरों को लौट रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विगत 12 मई को राष्ट्र के नाम सम्बोधन मे लाॅकडाउन 4.0 का जिक्र किया है, इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपने देश के नाम इस संबोधन मे यह भी कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने के खातिर लागू होने वाला लाॅक डाउन 4.0 अनोखा होगा. यहां अगर प्रधानमंत्री थोड़ा सा भी आगामी लाॅक डाउन को लेकर इन कार्यक्षेत्रों से पलायन कर अपने गृह क्षेत्रों को लौट रहे मजदूरों को भविष्य मे सरकार रेल यातायात के साथ ही सड़क परिवहन को खोलने को लेकर सरकार क्या कोई ढील दे रही है इन बातों का खुलासा कर देते तो शायद ये असहाय मजदूर इस तरह पैदल और कंटेनरों मे भरकर अपने घरों को ना लौटते या कुछ दिन और इतंजार कर लेते लेकिन यहां आगे क्या होगा इसको लेकर ये गरीब असहाय मजदूर आशंकित हैं तथा इस अनिश्चितता के हालात मे बस किसी भी सूरत में अपने घरों को लौटने को बेताब हैं. दूसरा कई मजदूरों ने आरोप लगाया कि वे जिन लोगों के यहां काम कर रहे थे उन्होंने मजदूरों को वहां से भगा दिया और मजबूरी के चलते ये लोग सड़कों पर आ गये. दूसरा कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनसे रेलयात्रा का किराया भी अवैध रूप से वसूला जा रहा है. अब प्रश्न यह उठता है कि जब इन मजदूरों को बिना पैसे के उनके घरों तक पंहुचाया जा रहा है जिसमें लगभग 80 प्रतिशत केन्द्र तथा लगभग 20 प्रतिशत राज्य सरकार भुगतान कर रही हैं तो फिर इन मजदूरों से टिकटों के नाम पर अवैध वसूली कौन कर रहा है सरकार को इसकी भी पड़ताल करनी चाहिए तथा दोषियों को कठोर दण्ड मिलना चाहिए. दूसरा इन कार्यक्षेत्र से मजबूरी में पलायन कर रहे मजदूरों के लिए भी इस भारी भरकम आर्थिक पैकेज से कुछ राशि निकाल कर तत्काल सहायता के रूप मे उपलब्ध कराई जानी चाहिए, क्योंकि कोरोना संक्रमण काल मे यदि कोई वास्तविक रूप से प्रभावित हुआ है तो वह है दिहाड़ी तथा असंगठित क्षेत्र का मजदूर क्योंकि वह जितना रोज कमाता है उसी मे अपना तथा अपने परिवार का भरण पोषण करता है तथा इनके पास दो पैसे भी जमा पूंजी के नाम पर नही होती, और सच यही है कि आर्थिक पैकेज अगर वास्तविक अर्थों मे चाहिए तो केवल इन असंगठित और दिहाड़ी मजदूरों के हित मे होना चाहिए बाकी सरकारी कर्मचारियों को तो वेतन मिल ही रहा था उद्योग जगत भी इतनी गर्दिश मे नही है कि महज 50, 60 दिनों के लाॅकडाउन के चलते बुरे हालात में पहुंच गया हो. उद्योगो के पास दिक्कतें हैं लेकिन पहले से कमाई पूंजी भी तो है. किसान को भी कोरोना संक्रमण काल मे थोड़ी सी ही दिक्कत रही है. अतः केन्द्र सरकार को अपने इस भारी भरकम आर्थिक पैकेज का एक बड़ा भाग वास्तविक मजदूरों जी हां सिर्फ वास्तविक और दिहाड़ी मजदूरों पर खर्च करना चाहिए.।।विभू ग्रोवर।।

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