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अब शिक्षा की चिंता

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विश्वव्यापी महामारी कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने की खातिर भारत सरकार द्वारा लागू लाॅक डाउन के चलते महाविद्यालयों तथा स्कूल, काॅलेजों की शिक्षा पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। हालांकि उच्च शिक्षा माध्यमिक और बेसिक स्तर के सभी छात्र छात्राओं की सोशल मीडिया जिसमें व्ह्टस एप के माध्यम से भी महाविद्यालयों कालेजों तथा स्कूलों ने ऑन लाइन शिक्षण के माध्यम से भी कक्षा संचालित की लेकिन भारत ही नही दुनिया के साठ प्रतिशतः देशो में आज भी पचास प्रतिशत लोग जब इंटरनेट का उपयोग ही नही करते तो फिर आनॅ लाइन शिक्षण महज चंद अभिभावकों के पाल्यों की पंहुच तक ही सीमित माना जा सकता है। भारत मे आज भी यदि अधिक से अधिक कहें तो चालीस करोड़ लोग ही इंटरनेट का उपयोग करते हैं इन हालातों में आनॅ लाइन शिक्षा ढकोसला भर नही मानी जानी चाहिए ? आज भी देश मे कई क्षेत्रों में संचार सेवाओं की स्थिति अत्यधिक दयनीय बनी हुई है। और कहीं आबादी के एक बहुत बड़े वर्ग के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करना ही भारी होता है अतः इंटरनेट तो शायद इन लोगों ने ढंग से सुना भी होगा कि नही कि आखिर यह बला क्या है।

अब इन हालातों में कल्पना कीजिए कि वास्तविक हालातों में क्या हकीकत है आनॅ लाइन शिक्षण की महज आबादी के अधिकतम तीस पैंतीस प्रतिशत लोग ही शायद इन आनॅ लाइन कक्षाओं का थोड़ा सा लाभ उठा पायेंगे। जब उच्च शिक्षण संस्थानों में ही दूरस्थ शिक्षा के साधन इतने सफल नही हो पाये है अथवा इन दूरस्थ शिक्षण संस्थाओं की उच्च शिक्षा के प्रसार मे भूमिका बेहद कम है तो स्कूल और काॅलेजों मे आनॅ लाइन शिक्षण की बातें हवा हवाई ही अधिक साबित होती हैं। दूसरा आज भी देश की अधिसंख्य आबादी सरकारी स्कूलों में पढती है ग्रामीण भारत में तो अस्सी प्रतिशत तक शिक्षा का भार सरकारी स्कूल और काॅलेजों के ऊपर है जहां कहीं विद्यालय भवन नही हैं तो कहीं शिक्षक नही हैं कहीं संचार व्यवस्था बेहद बदहाली के आंसू बहाती दिखती है तो अब कल्पना कीजिए इन स्कूलों के छात्रों की आनॅ लाइन पढाई की हकीकत क्या हो सकती है या यहां क्या इंटरनेट के माध्यम से शिक्षण सम्भव है ! शायद नही फिर इस आबादी के बहुत बड़े हिस्से के छात्र- छात्राओं की शिक्षा को आगे कैसें बहाल किया जा सके यह राज्य सरकारों तथा उसके शिक्षा महकमें के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन रही है, और वह भी तब जबकि कोरोना वायरस का संक्रमण भले ही केन्द्र तथा राज्य सरकारों की अच्छी रणनीति के चलते सीमित क्षेत्र तक तथा उसका प्रसार सीमित कर दिया गया हो, फिर भी अभी यह कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी तरह समाप्त हो गया हो यह भी नही माना जा सकता। फिर इन हालातों में राज्य सरकारों के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं।

पहला यह कि क्या बच्चों को इन हालातों में स्कूल बुलाया जा सकता है वह भी तब जबकि सरकारी तो छोडिए निजी स्कूलों में भी इतनी जगह कक्षा कक्षो मे सम्भव नही है कि वहां वांछित सामाजिक दूरी का अनुपालन हो सके फिर कक्षा पांचवी से नर्सरी कक्षा के अबोध बच्चे आते हैं जिन्हें कोरोना वायरस संक्रमण के इन हालातों में न सरकार चाहेगी ना स्कूल और ना ही अभिभावक कि इन मासूमों को स्कूल भेजा जाए। वही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कोरोना वायरस संक्रमण के हालातों को देखते हुए दिल्ली में स्कूलों में आगामी जुलाई महीने तक अवकाश घोषित कर दिया है। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डाॅक्टर धन सिंह रावत ने वर्तमान हालातों पर उच्च शिक्षा के संदर्भ में गढवाल तथा कुमांऊ संभाग के शासकीय और अशासकीय महाविद्यालयों के प्राचार्यों के साथ ऑन लाइन मंथन किया ।अब करोना संक्रमण काल में शिक्षा को किस तरह पटरी पर पर लाया जाए, यह यक्ष प्रश्न है और वर्तमान में तो जुलाई तक स्कूल काॅलेजों मे अवकाश ही एक बेहतर विकल्प दिख रहा है।

।।विभू ग्रोवर।।

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