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बेमौत मर रहे मजदूरों की सुध लेने की जरूरत

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कोरोना संक्रमण काल में कोरोना वायरस संक्रमण के मुकाबले सड़कों पर वाहनों की चपेट में आने से प्रवासी मजदूर अपनी जान अधिक गंवा रहे हैं. हर रोज देश के किसी ना किसी क्षेत्र से खबर आती है कि अमुख जगह पर इतने मजदूर दुर्घटना में मारे गये. कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने की खातिर लागू लाॅक डाउन के चलते अगर सबसे अधिक मार किसी पर पड़ी है तो वह है मजदूर वर्ग असंगठित क्षेत्र के दैनिक दिहाड़ी मजदूर जहा ठेकेदारों के साथ काम कर रहे थे उन्हें ठेकेदारों ने कार्यक्षेत्र में काम बंद होने के बाद हटा दिया. ना खाने के लिए भोजन और ना रहने का ठिकाना आखिर ये असंगठित क्षेत्र के मजदूर जाते भी तो कहां. अतः इन निरीह असहाय मजदूरों को घर वापसी के लिए जो भी साधन मिलता वे उसी को पकड़ कर अपने गृहक्षेत्रों को लौटने लगे हैं. कई अप्रवासी मजदूर तो पैदल ही सामान सर पर लादे अपने बच्चों के साथ हजारों किलो मीटर की यात्रा भूखे प्यासे दिन रात अनथक यात्रा मे लगे हैं लेकिन किस्मत की मार भी हमेशा गरीब पर ही पड़ती है. उत्तर प्रदेश के औरया में एक कंटेनर मे बैठकर अपने गृहक्षेत्र लौट रहे इन मजदूरों के लिए शनिवार का दिन बुरा साबित हुआ. इन मजदूरों से भरे कंटेनर पर एक डीसीएम ने जोरदार टक्कर मार दी जिससे कि 24 से अधिक मजदूरों की मौत हो गई है जबकि 35 अप्रवासी मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गये. इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में कोरोना वायरस संक्रमण के चलते लागू लाॅक डाउन के कारण मुसीबत के शिकार ये दैनिक दिहाड़ी तथा असंगठित क्षेत्र के मजदूर जब पैदल ही अपने घरों को लौट रहे थे तो एक शराब के नशे मे वाहन चला रहे व्यक्ति ने इन गरीब मजदूरों को कुचल डाला था जिसमें छः के लगभग मजदूर दुर्घटना स्थल पर ही मारे गये तथा कुछ गंभीर रूप से घायल हो गये थे. इसी तरह की एक घटना महाराष्ट्र के औरंगाबाद से छत्तीसगढ लौट रहे मजदूर जब लम्बीं यात्रा के बाद ट्रेन की पटरी पर सो रखे थे तो एक मालगाडी उनके ऊपर से गुजर गयी. जिसमें कई गरीब और असहाय मजदूर और उनके मासूम बच्चे मारे गये. क्या असंगठित क्षेत्र के गरीब कमजोर मजदूरों की यही नियति है. एक तरफ कार्यक्षेत्र मे काम बंद होने के चलते ठेकेदार द्वारा इनको जाने को कहा गया दूसरा मजदूरी भी मिली कि नही कोई पूछने वाला नही. केन्द्र सरकार ने कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने की खातिर लागू किए लाॅक डाउन से प्रभावित उद्योग, कृषिक्षेत्र लघु तथा मध्यम व्यावसाइयों तथा दूसरे और क्षेत्रों को राहत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पैकेज की घोषणाएं प्रारम्भ कर दी हैं और निश्चित रूप से सभी प्रभावितों को अगर सम्भव हो तो प्रोत्साहन सहयोग मिलना चाहिए. लेकिन कमजोर तबके के असंगठित क्षेत्र के उन मजदूरों के लिए सबसे पहले आर्थिक पैकेज मिलना चाहिए जो दिहाड़ी मजदूर है, इसके साथ ही दूसरे कम आय वर्ग के लोग जिनकी मासिक आय दस हजार से नीचे है उन्हें भी मदद की सबसे अधिक दरकार है. सरकार को चाहिए कि अपने कार्यक्षेत्र से अपने गृहक्षेत्र को पलायन कर रहे इन प्रवासी मजदूरों को जब तक उनको उनके गृहक्षेत्र तक सड़क परिवहन से अथवा रेल मार्ग से उनके गृह क्षेत्रों तक पंहुचाने की समुचित व्यवस्था नही हो जाती तब तक उन्हें जहाॅ वे वर्तमान समय मे हैं वहीं रोजगार उपलब्ध कराया जाए. जिससे कि उनके आगे रोजी रोटी की समस्या ना हो तथा उन्हें पैदल अथवा कंटेनरों आदि मे जानवरों की तरह लदकर यात्रा ना करनी पड़े. दूसरा जब पूरे देश में लाॅक डाउन है तो ये निरीह मजदूर कैसे इस तरह कंटेनरो मे अथवा पैदल यात्रा करने को मजबूर हैं क्या इनको फिलहाल इनके वर्तमान जगह में ही फौरी राहत उपलब्ध नही कराई जा सकती, जिससे कि इन प्रवासी मजदूरों को अनिश्चय और दुविधापूर्ण परिस्थितियों से निकाला जा सके तथा ये अप्रवासी मजदूर यूं ही दुर्धटनाओं मे मारे ना जाते रहें ।।विभू ग्रोवर।।

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